जिगना की पाती,जिगना के नाम

पत्र दिनांक - संवत 2080 ,

                              बसंत पंचमी आज जब मैं यह लेख लिख रहा हूं तो मेरे चारों ओर बसंत पंचमी के पर्व पर निकले नव किसलय, मुझे अनायास ही अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं , ऐसा नहीं है कि यह नव किसलय पहली बार निकले हैं, प्रत्येक वर्ष ऐसे ही बसंत पंचमी पर नव किसलए आते हैं -- लेकिन उससे पहले पतझड़ इन पेड़ पौधों को अपनी मार से और मौसम अपनी प्रताड़ना से इनको आघात पहुंचा चुके होते हैं , एक लंबे इंतजार के बाद, इन्हें इस सुख की अनुभूति होती है । 

 इन चंद शब्दों से आप एक बात तो समझ ही गए होंगे कि हर एक मौसम का एक निश्चित समय होता है , एक निश्चित समय के बाद में समय सबका आता है । मेरे प्रिय जिगना परिवार के साथियों, आज मैं जो कुछ भी लिखने जा रहा हूं यह शब्द ना सिर्फ आपके व्हाट्सएप पर पहुंच रहे हैं, बल्कि मेरी ब्लॉग पर अगले कई वर्षों तक के लिए अजर अमर होने वाले हैं , मैं नहीं रहूंगा उसके बाद भी यह शब्द वहां पड़े रहेंगे , और आने वाली पीढ़ियां अगर कहीं से इसका लिंक पा जाएंगी ,तो इसे फिर से पढ़ पाएंगे ।

 https://gyankacapsule.blogspot.com/2024/02/blog-post.html 

                     आज के बसंत पर दो बातें खास हो रही है --- पहली विशेष बात यह है की जिगना का एक अंश अपने संपूर्ण जीवन के समस्त कर्म-काण्डों को पूर्ण करके अपने कुल के सहित कुटुंब के हितार्थ भागवत परायण आरंभ कर रहा है -  दूसरे शब्दो मे कहें तो एक सूर्य अस्ताचल को चल पड़ा है, सेवानिवृत्ति मैं इसलिए नहीं कहूंगा क्योंकि इस अंश में अभी बल और साहस बाकी है, इस बल और साहस से अभी उसे बहुत कुछ करना बाकी है जिसे हम सोच भी नहीं सकते ,   वहीं एक जिगना के अंश का सूर्योदय हो रहा है वह अपने नए जीवन साथी के साथ नए जीवन के पथ पर पदार्पण कर रहा है। इन दोनों जिगना के अंशो में कोई समानता नहीं है, क्योंकि एक अंश अपने जीवन के लगभग 60 वर्ष पूर्ण कर चुका है और दूसरा अंश अभी नवयुवक है 
                अब मुख्य मुद्दे पर मैं अपनी बात लिखता हूं । इन दोनों विशेष संयोग जनित जीवनोत्सव में मुझे एक बात समान लगी ,और वो है इन परिवारों के फ़ॉलोअर्स और फ़ॉलोविंग और इन्हें लाइक 👍 करने वालो की संख्या ।
 एक बात यहां अच्छे से समझ लीजिए कि सिर्फ यही दो परिवार ही नहीं, आज पूरे संसार में सभी परिवारों के फॉलोअर्स और फॉलोइंग तो बहुत है किंतु उनके लाइक्स बहुत कम है , यहां लाइक्स का मेरा मतलब उन लोगों से है, जो सुख और दुख में हमारे साथ खड़े रहते हैं -- और फॉलोअर्स और फॉलोइंग का मतलब उन लोगों से है , जो हमारे आगे पीछे घूमते रहते हैं या हम उनके आगे पीछे घूमते रहते हैं, मौके पर हमें इस्तेमाल करने वाले समाज में जिनके सामने हम अपनी झूठी शान दिखा करके अपना एक बड़ा जन समुदाय तैयार करते हैं, यही दशा आपकी भी होगी और यही दशा मेरी भी है कि हमारे फॉलोअर्स और फॉलोविंग्स तो बहुत है मतलब जब हमारे घर कोई कार्यक्रम होगा तो खाने वालों की संख्या तो हजारों में होगी , लेकिन जब हमारे पास खाने को नहीं होगा तो देने वालों की संख्या दो या चार होगी, और यही वो दो - चार है , जिनको मैं आज लाइक करने वाले कह रहा हूं ।

 जिगना के इस छोटे से कुनबे में चार परिवार से आज 24 परिवार हो गए हैं, लेकिन इस कुनबे के हर अंश पर अगर मैं बात करूं तो प्रत्येक अंश अब एक दूसरे अंश से बहुत दूर हो चुका है ,और सब की जड़ों को अगर टटोला जाए, तो सब की जड़ में सिर्फ एक मात्र कारण है -- एक दूसरे के प्रति दो चार हाथ जमीन का विवाद । 
जमीन के विवाद से इस कुनबे का कोई भी अंश वंचित नहीं बचा चाहे, उसमें अनपढ़ परिवार हो, इंजीनियर परिवार हो, मास्टर परिवार हो, चपरासी परिवार हो, पुलिस परिवार हो, व्यापारी परिवार हो, किसान परिवार हो, पुरोहित परिवार हो, नौकरीपेशा हो - सब के हिस्से में जमीन से संबंधित विवाद या तो खुद चल कर आया या उसने खुद मोल ले लिया और इस विवाद के चक्कर में हम अपने ही परिवार के अंश यानी कि अपने ही खून का अन्न खाना त्याग चुके हैं , और यही एक बात मुझे हमेशा काटती रहती है ; की दो चार हाथ जमीन के विवाद के पीछे हम अपने परिवार का अन्न खाना छोड़ चुके हैं
                      हमें सीख लेनी चाहिए हमारी रामायण की गाथा से ना की महाभारत की गाथा से -- अगर हमारे देश में महाभारत हुई है तो हमारे ही देश में रामायण भी हुई है और हम ऐसे राम की भूमि में पैदा हुए हैं , जो हमें सहिष्णुता सिखाती है, जो हमें आदर्शों पर चलना सिखाती है मैं अगर जिगना के कुनबे की ही बात करूं तो जिगना के दो अंश ऐसे भी हैं जिनके बीच में जमीन के विवाद को लेकर के न सिर्फ लाठी -डंडे, पत्थर - ईट ही चले हैं बल्कि गोलियां तक चली है , लेकिन आज दोनों परिवार एक दूसरे का अन्न खा रहे हैं

                             इस पत्र के माध्यम से मैं प्रत्येक जिगना के कुनबे से यह आग्रह करूंगा , यह अनुरोध करूंगा कि सभी आपस में अपने-अपने विवाद को सुलझा ले और सभी कम से कम अपने परिवार के बीच में अन्न का त्याग ना करें , मैं जानता हूं कि मेरे पत्र लिखने मात्र से यह कतई संभव नहीं है, लेकिन फिर भी मैं अपना दुख किससे कहूं ?? इसीलिए मैं अपनी बात को अपने ब्लॉग पर लिख रहा हूं , ताकि मेरा मन हल्का हो सके .
हम सब अपने फॉलोइंग और फॉलोअर्स तो बढ़ा ही रहे हैं, लेकिन हमें यह देखना होगा कि हमें लाइक कितने लोग कर रहे हैं ? हम हजारों लोगों को अपने उत्सव में शामिल कर लें ,लेकिन वह खुशी, वह आत्मसंतोष तब तक हमें नहीं मिलेगा जब तक मेरे परिवार का , मेरा अंश, मेरा खून मेरा अन्न नहीं ग्रहण करेगा, यह मेरी अपनी व्यक्तिगत सोच है । आपकी क्या सोच है ? 
               हमारे पूर्वजों ने गांव की हर दिशा में पेड़ पौधे लगाए और उस पर अपना अधिकार किया, क्योंकि पूर्व के समय में पेड़ पौधे लगा करके हम बाहरी आक्रमण और बाहर से आने वाले आसामाजिक तत्वों से अपने परिवार की रक्षा करते थे, उस परिपेक्ष्य में आज प्रत्येक जिगना के अंश के अधिकार में दूसरे जिगना के अंश का एक सूक्ष्म भू भाग या तो सहन दरवाजे पर या कही न कही बलात ही प्रयोग में है, किंतु इन विवादों का मतलब यह नही की मैं किसी के आंगन में मात्र कुर्सी भर रखने की जमीन का षडयंत्र करूँ ,और वो अपने ही आंगन में बैठने के लिए अदालत से अनुमति ले, ये सत्य है कि पूर्व काल के अनुसार वह भूभाग किसी और का था और है , किंतु सामाजिक प्रगति को ध्यान में रखकर हमे अपने विवाद सुलझाने होंगे । 
  दो चार हाथ भूमि या खटिया भर जमीन के विवाद को लेकर के हम जितना समय , जितनी बुद्धि और जितना धन पिछले कई वर्षों में खर्च कर चुके हैं, यदि उतना समय, उतनी बुद्धि और उतना धन; उतनी ही जमीन कहीं और बनाने के लिए खर्च कर देते तो हमें अपने परिवार का अन्न नहीं त्याग करना पड़ता, हमारे फॉलोअर्स और फॉलोइंग के साथ-साथ हमारे लाइक्स भी ज्यादा होते और हमारी एक नई संपत्ति भी बन चुकी होती. 
इस अंतिम पैराग्राफ को दोबारा जरूर पढ़िएगा । हम सब के जीवन का भी पतझड़ दूर हो ,बसंत आये ,नव किसलय मुस्काये इसी आशा के साथ बड़ो को प्रणाम छोटो को प्यार । 
 पुनः आप सभी को पत्र पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद , बहुत-बहुत साधुवाद- सभी को जय श्री राम......

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