शादी से पहले जानना जरूरी है !! Impotance of Orgasm in sex - शारीरिक और मानसिक परिभाषा ,स्वरूप
✍️💞💖💕🌹💗😘 संभोग या सहवास ( sex ) केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का जटिल समन्वय है। उसके बाद का क्षण भी उतना ही गहन और संवेदनशील होता है। पुरुष और स्त्री दोनों का अनुभव अलग होता है, और उसे समझना आत्म-जागरूकता और आपसी सामंजस्य के लिए आवश्यक है।
इस लेख को दो भाग में बांट कर इस कहानी को आसानी से समझने का प्रयास करते हैं ....
पहले भाग में समझते हैं कि एक स्त्री के लिए इस क्रिया को जानना कितना जरूरी होता है ??
यह क्रिया जीवन के अहम विषय से कैसे जुड़ी है??
इस विषय पर किसी स्त्री को बताया ,समझाया, शिक्षा क्यों नहीं दी जाती ?
और सबसे जरूरी बात की यह विषय विवाह से पहले जाने रहना क्यों आवश्यक है??
इस विषय पर मै आगे कुछ कहूं, इससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि स्त्री और पुरुष के बीच में बनने वाला संबंध शरीर के अंदर से उठने वाली उत्तेजना , जोश या कामुकता पर निर्भर करता है , पुरुष में यह कामुकता कभी भी जग सकती है !!!! किंतु स्त्री में यही कामुकता जगानी पड़ती है इसे ही ऑर्गेज्म / कामोन्माद / कामुकता / जोश कहते हैं।
पार्ट 1.1 स्त्री का ऑर्गेज्म ( कामोन्माद , कामुकता )
“स्त्री के ऑर्गैज़्म का योनि से कोई संबंध नहीं है ,
योनि तो केवल प्रजनन की व्यवस्था है।
स्त्री का ऑर्गैज़्म पुरुष द्वारा योनि के माध्यम से संभोग करने पर भी निर्भर नहीं है ????
वह तो केवल प्रजनन के लिए ठीक है।
स्त्री के पास एक अलग अंग है—बहुत छोटा-सा—क्लिटोरिस, जो पुरुष के संभोग के मार्ग में नहीं आता।
लेकिन जब तक पुरुष स्त्री की शारीरिक संरचना (फिज़ियोलॉजी) को नहीं समझता—( और सामान्यतः कोई पुरुष समझता भी नहीं ) —
तब तक सेक्स / सहवास / संसर्ग / हनीमून / सुहागरात कुछ भी कह लीजिए , वो बात/ फीलिंग नहीं आती ।
मनुष्य दुनिया का एकमात्र ऐसा अनुभवहीन कामुक युगल है, जिसे विवाह से पहले न तो पुरुष को कोई अनुभव होता है और न ही स्त्री को।
यह बहुत अजीब है , लेकिन करें क्या यही दस्तूर है — दो लोग पूरी ज़िंदगी साथ रहने जा रहे हैं, और उन्हें यह भी नहीं पता कि क्या करना है।
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1.2✍️✍️✍️ स्त्री का क्लिटोरिस ही वह अंग है ,जो उसे सुख देता है, और वह उसकी योनि का हिस्सा नहीं है। पुरुष का स्खलन अधिकतम दो-तीन मिनट में हो जाता है। और उसे जल्दी मची रहती है, क्योंकि वह संभोग का पाप कर रहा है,—ज़्यादा देर मत करो, नहीं तो याद रखना, नर्क की आग!!!!
जब तक पुरुष स्त्री की शारीरिक रचना को नहीं समझता— तब तक पुरुष स्त्री को असली चरम सुख नहीं दे सकता , और इसकी कभी उसने ज़हमत ही नहीं उठाई— तब तक वह यह नहीं समझेगा कि स्त्री का पूरा शरीर यौन-संवेदनशील होता है। जबकि पुरुष का पूरा शरीर यौन-संवेदनशील नहीं होता, पुरुष की कामुकता बहुत स्थानीय होती है—सिर्फ़ उसके यौन अंग ( शिश्न ) तक सीमित।
किंतु स्त्री का पूरा शरीर कामुक होता है। और जब तक पुरुष उसके पूरे शरीर के साथ खेलकर, उसे जगाकर—यानी फ़ोरप्ले करके—उत्तेजित नहीं करता, तब तक स्त्री जागती ही नहीं। लेकिन कोई पुरुष यह करना नहीं चाहता, या यूं कहें जानता ही नहीं , क्योंकि इसमें समय लगता है, और जल्दी करनी होती है— कहीं पड़ोसी न देख लें , कोई आ न जाए! इसलिए फ़ोरप्ले ❌❌❌ जैसी कोई चीज ही नहीं करता ! !
1.3 ✍️✍️ पोजिशन
ख़ासकर ईसाइयों ने ‘मिशनरी पोज़िशन’ को प्रचलन में लाया, जिसमें सुंदरता नीचे और जानवर ऊपर होता है। बेचारी स्त्री को लगभग मरी हुई-सी लेटना पड़ता है—तभी वह ‘लेडी’ मानी जाती है।
आनंद तो सिर्फ़ वेश्याएँ लेती हैं। मजे से लिपट कर , अंग अंग सहला कर ..... आह........!!!!!!
एक सम्मानित स्त्री कराहे नहीं, आहें न भरे, खुशी में बुदबुदाए नहीं, चिल्लाए नहीं। इसलिए उसे सिखाया गया कि पुरुष के संभोग के समय वह बिल्कुल निर्जीव रहे। यह एकतरफ़ा सेक्स — नारी बिल्कुल मुर्दे सी रहे , दोष समाज का भी है हम अपने घर की स्कूल की स्त्रियों को सब कुछ सिखा देते है बता देते है लेकिन जिस जीवन आधार के लिए वैवाहिक संस्कार वास्तव में होता है उसकी एबीसीडी पढ़ाना घोर अपराध समझते है , शर्म आती है , आखिर क्यों ????
सेक्सोलॉजी और काम शास्त्र कहता हैं, कि स्त्री को ऊपर होना चाहिए ताकि उसे अधिक गतिशीलता मिले, और पुरुष नीचे हो ताकि वह शांत रह सके—क्योंकि उसका स्खलन जल्दी हो जाता है! अगर वह शांत रहे तो बीस-तीस मिनट संभाल सकता है। स्त्री को उत्तेजित होने में कम-से-कम दस मिनट लगते हैं। पुरुष को यह समझना होगा कि स्त्री सिर्फ़ उपयोग की जाने वाली मशीन नहीं है। वह भी एक आत्मा है, उतनी ही जीवित, और उसे भी उतना ही सुख पाने का अधिकार है जितना पुरुष को ।
इसलिए फ़ोरप्ले आवश्यक है, और इस दौरान बार बार दोनों स्त्री पुरुष नीचे ऊपर हो सकते है । स्त्री को शरारती बनने दे , उसे खेलने दे , चूमने दें, पुरुष भी स्त्री के अंग अंग में उंगली फेरे , तभी यह संभव है कि दोनों एक साथ ऑर्गैज़्म तक पहुँचें। जब दोनों थरथराने लगें, नियंत्रण से बाहर होने लगें—तभी वे जानेंगे कि सेक्स का असली सुख क्या है। यह केवल प्रजनन का अंग नहीं है; यह अपार आनंद का भी अंग है। और वह आनंद—मेरे अनुसार—ध्यान की पहली झलक देता है, क्योंकि उन क्षणों में आंखे बंद हो जाती है , मन वही ठहर जाता है, समय रुक जाता है। कुछ क्षणों के लिए न समय रहता है, न मन— केवल गहन मौन और आनंद।
बेमन के भी आनंद की अवस्था में प्रवेश किया जा सकता है। सेक्स में फोरप्ले अर्थात दोनों एक दूसरे के तन से खेले ,चूमे , इसके अलावा किसी और प्रकार से सेक्स के असीम सुख की संभावना ही नहीं है , जिससे हम यह समझ सके कि लिंग डालकर ,हिलाकर चार मिनट में काम खत्म कर देने के पार भी सेक्स का कोई सुख है।
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पार्ट 2 ✍️✍️ इस भाग में हम स्त्री और पुरुष के अनुभवों पर चर्चा करेंगे।
2.1 ✍️✍️ पुरुष का अनुभव
सम्भोग के बाद पुरुष का शरीर और मन अचानक शिथिल और आराम की ओर झुकता है।
शारीरिक अनुभव: लिंग ढीला पड़ता है, मांसपेशियों में थकान।
हृदय गति धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है। साँसें लंबी, धीमी और गहरी हो जाती हैं।
शरीर भारीपन और ऊर्जा के बहाव की कमी महसूस करता है।
मानसिक स्थिति: पुरुष आत्मनिरीक्षण की ओर झुकता है।
अनुभव को पचाने और ऊर्जा को स्थिर करने की आवश्यकता होती है।
संवेदनाओं पर ध्यान कम हो जाता है; मन अंदर की ओर केंद्रित होता है।
इंद्रिय अनुभव:
स्पर्श और नज़दीकी की तीव्रता कम।
आंखें आधी बंद, शरीर शिथिल और आराम की स्थिति में।
पुरुष इस समय अनुभव को अंदर की दुनिया में संजोता है। यह समय उसके लिए एकांत और मानसिक स्थिरता का है।
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2.2 ✍️✍️ स्त्री का अनुभव
स्त्री का शरीर सम्भोग के बाद भी ऊर्जावान और संवेदनशील बना रहता है। उसका अनुभव अभी भी तीव्र और विस्तृत होता है।
शारीरिक अनुभव:
त्वचा पर हल्की गर्माहट, हर स्पर्श में संवेदना।
स्तन, योनि और हाथ-पैर में हल्की हलचल, ऊर्जा पूरे शरीर में फैलती है।
श्वास गहरी और नियमित, कभी-कभी हृदय की धड़कन तेज़।
मानसिक स्थिति:
साझा अनुभव की चाह, भावनाओं और संवेदनाओं के केंद्र में बनी रहती है।
मानसिक रूप से अभी भी जुड़ी हुई और जागरूक।
इंद्रिय अनुभव:
हर हल्का स्पर्श, हर साँस, हर हृदय की धड़कन उसे भीतर से खिला हुआ और आनंदित महसूस कराती है।
संवेदनाएं गहरी और जीवंत बनी रहती हैं।
स्त्री इस समय अनुभव को बाहरी और साझा रूप में जीती है। यह पल उसके लिए खिलने और जुड़ने का समय है।
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2.3 ✍️✍️ ऊर्जा का प्रवाह और सामंजस्य
सम्भोग के बाद यह अंतर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि ऊर्जा का प्रवाह है।
पुरुष ऊर्जा को बाहर छोड़ देता है और थकान अनुभव करता है।
स्त्री वह ऊर्जा ग्रहण करती है और उसे अपने भीतर फैलती हुई स्फूर्ति और आनंद के रूप में अनुभव करती है।
यही अंतर उनके भावनात्मक और मानसिक व्यवहार में दिखाई देता है।
यदि दोनों इस अंतर को समझें और स्वीकार करें, तो यह क्षण केवल शारीरिक संतोष का नहीं बल्कि भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक जुड़ाव का भी स्रोत बन सकता है।
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2.4 ✍️✍️ पल की सूक्ष्मता: स्पर्श, साँस और हृदय की धड़कन
कल्पना कीजिए इस पल का
पुरुष की आँखें आधी बंद, शरीर शिथिल, और प्रत्येक साँस धीरे-धीरे बाहर निकलती है।
स्त्री की आँखें चमक रही हैं, हाथ और त्वचा संवेदनाओं को महसूस कर रहे हैं।
उसका हृदय तेज़ धड़क रहा है, उसकी ऊर्जा अभी भी बह रही है।
पुरुष के शरीर से ऊर्जा बाहर बह चुकी है, स्त्री के शरीर में वही ऊर्जा खिल रही है।
यह पल दो अलग दृष्टिकोणों के बीच सामंजस्य का है: पुरुष अपने अंदर, स्त्री बाहर की ओर फिर भी अनुभव जुड़ा हुआ।
सम्भोग के बाद का क्षण सिर्फ शारीरिक क्रिया का नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का गहन अनुभव है।
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पुरुष: थकान और एकांत में अनुभव को आत्मनिरीक्षण में पचा रहा।
स्त्री: ऊर्जा में खिलना और साझा अनुभव की चाह।
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यदि यह अंतर समझा जाए और स्वीकार किया जाए, तो यह पल दोनों के बीच गहरा, संतुलित और सूक्ष्म जुड़ाव बन सकता है।
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..... संकलन शब्द संयोजन ✍️✍️ ज्ञान प्रकाश मिश्र "बाबुल
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